Saturday, October 6, 2012

उद्घाटन सत्र रिपोर्ट दि. 06-10-2012


डॉ. रामविलास शर्मा जन्मशती समारोह और दो दिवसीय संगोष्ठी का
केंद्रीय हिंदी संस्थान के नज़ीर सभागार में उद्घाटन

दुनिया भर में साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद दलालों के ज़रिए चलता और फलता-फूलता रहा है। कुछ अनिवासी भारतीय बुद्धिजीवियों की जमात के जरिए यह नए रूप और तौर-तरीकों के साथ अपनी पैठ बना रहा है। डॉ. रामविलास शर्मा ने साम्राज्यवाद के खतरों के प्रति न केवल आगाह किया बल्कि इनसे लड़ने की प्रेरणा भी दी। डॉ. शर्मा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम वर्तमान समय में उपस्थित नव-साम्राज्यवाद के खतरों को पहचाने और उनका सामना करें।, यह विचार हिंदी के वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर मैनेजर पांडेय ने केंद्रीय हिंदी संस्थान के नज़ीर सभागार में आयोजित डॉ. रामविलास शर्मा जन्मशती समारोह की उद्घाटन संगोष्ठी में अपने बीज वक्तव्य के दौरान रखे। डॉ. रामविलास शर्मा के साहित्यिक और वैचारिक अवदान की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आरोपित और आयातित अमरीकी विचारों का वैश्वीकरण इस युग की बड़ी चिंता है जिसकी वजह से न केवल आज भारतीय भाषाएँ खतरे में हैं बल्कि लोक भाषाओं के अस्तित्व पर भी गहरा संकट है। डॉ. शर्मा ने परंपरा की पहचान करते हुए हिंदी आलोचना की निजी जातीय परंपरा को मजबूती के साथ प्रस्तुत किया।कार्यक्रम के उद्घाटन से पूर्व केंद्रीय हिंदी संस्थान परिसर में स्थापित डॉ. रामविलास शर्मा की प्रतिमा पर स्थानीय एवं आगंतुक विद्वानों ने माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। संगोष्ठी के आरंभ में दयालबाग डीम्ड विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. कमलेश नागर ने आए हुए विद्वानों और अतिथियों का स्वागत किया। इसके बाद डॉ. रामविलास शर्मा के भाई और उनके साहित्यिक सहचर मुंशी जी के निधन पर मौन रखकर शोक व्यक्त किया गया। 
औपनिवेशिक मुक्ति के विमर्श और डॉ. रामविलास शर्मा विषय पर उद्घाटन सत्र की चर्चा को विस्तार देते हुए केंद्रीय हिंदी संस्थान के पूर्व निदेशक विख्यात आलोचक प्रोफेसर शंभुनाथ ने कहा कि आगरा में केवल ताजमहल ही नहीं बल्कि रामविलास शर्मा की चालीस साल की विराट साहित्यिक साधना भी विरासत के रूप में मौजूद है और यह विरासत जन-सहयोग से हो रहे इस आयोजन के माध्यम से और भी स्पष्ट एवं प्रबल रूप में उपस्थित हुई है। राष्ट्रवाद की विचारधारा का आरंभ राममोहन राय से होता है और वह रामविलास शर्मा के चिंतन में पूर्णता प्राप्त करती है। डॉ. रामविलास शर्मा का स्मरण करते हुए उन्होंने टिप्पणी की कि रामविलास शर्मा परंपरा की ओर उन्मुख होते हुए भी रूढ़िवादी नहीं थे। आधुनिकता के पक्षधर होते हुए भी उपनिवेशवादी नहीं थे और प्रगतिवाद के समर्थक होकर भी यांत्रिक भौतिकवाद से सम्मोहित नहीं थे। वे एक ऐसे बहुज्ञ चिंतक थे जो भारतीय भाषा, समाज और साहित्य की समस्याओं पर चिंतन करते हुए ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न छोरों को छूते हैं। उन्होंने अपने कृतित्व के माध्यम से ज्ञान का डी-कोलोनाइजेशन किया। वे परंपरा की परख के लिए जितना पीछे गए उतना ही आवेग और ताकत के साथ आगे बढ़कर साम्राज्यवाद के किले पर उन्होंने गोले दागे। उन्होंने हिंदी-भाषी समाज को उसकी अपनी जातीय पहचान और अस्मिता से रूबरू कराया। इसलिए आत्मविमोहन के इस दौर में वे आज भी प्रासंगिक हैं और आगे भी रहेंगे। 
हाथरस से आए डॉ. रामकृष्ण पांडेय ने समकालीन राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विसंगतियों को रेखांकित करते हुए कहा कि आर्थिक और सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के तिलस्म को तोड़ने के उपाय डॉ. शर्मा के साहित्य में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि एटम को तोड़ना बड़ा मुश्किल है परंतु जब ऊर्जा को हासिल करना दरकार हो तो ये कोशिश करनी ही होगी। पूरे विश्व को पूँजीवाद ने तरह-तरह के मुखौटे ओढ़कर गुलाम बनाया है। इस दुश्चक्र को पहचानने और तोड़ने की चेतना रामविलास जी के कृतित्व से मिलती है।
अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए पटना से पधारे प्रो. रामजी राय ने मुक्तिबोध का उल्लेख करते हुए कहा कि अपने आजाद देश के बुद्धिजीवियों को जितना गहराई से देखता हूँ उतना ही लगता है कि हम अभी तक उपनिवेश में जी रहे हैं। विभिन्न वक्ताओं के विचारों की विवेचना करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय नवजागरण के भीतर जो द्वैत है और कठिनतम संघर्ष के बावजूद अंततः समझौतावादी और समावेशी प्रवृत्ति है, उसे समझना और पहचानना होगा। डॉ. रामविलास शर्मा ने साम्राज्यवादी संघर्ष के समक्ष राष्ट्रवाद की भूमिका को जिस तरीके से और जिन संदर्भों के साथ देखा, परखा उसमें उनकी अपनी कुछ सीमाएं हो सकती हैं लेकिन उन सीमाओं और अंतर्विरोधों को ईमानदारी से स्वीकार कर आगे बढ़ने की जिम्मेदारी हम सब पर है, यही रामविलास शर्मा के सक्रिय बौद्धिक अवदान के लिए हमारी सच्ची कृतज्ञता होगी। 
कार्यक्रम का समापन पटना से पधारे सांस्कृतिक समूह हिरावल द्वारा विभिन्न प्रगतिशील कवियों की रचनाओं की संगीतमय प्रस्तुति से हुआ जिसे उपस्थित विद्वत्समाज ने भरपूर सराहा। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रियम अंकित ने किया।
आयोजन के फ़ोटोग्राफ़ का फ़ेसबुक एलबम को देखने के लिए इस लिंक पर जाएँ - 

     

Friday, October 5, 2012

प्रणय कृष्ण, महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी

डॉ. रामविलास शर्मा के भाई और प्रगतिशील आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ श्री रामशरण शर्मा 'मुंशी' का अवसान...
कल ४ अक्टूबर की सुबह हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील आन्दोलन के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ श्री रामशरण शर्मा'मुंशी ने दुनिया को अलविदा कहा. ९० वर्ष की आयु में भी वे जितनी उत्कट जिजीविषा से भरे हुए थे, उसे पिछली २२ जुलाई को दिल्ली के साहित्य अकादमी हाल में जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित 'रामविलास शर्मा जन्मशती' के अवसर पर उपस्थित कई पीढ़ियों के साहित्यानुरागियों और संस्कृति-प्रेमियों ने साक्षात देखा था. अस्वस्थ होने के बावजूद बेटे बहू के साथ कार्यक्रम में पहुंचकर उन्होंने हमें सुखद रूप से चौंका दिया था. अपने जीवन के सर्वोत्तम वर्ष उन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी को दिए, पूर्णकालिक तौर पर, बीमारी और अभाव में रह कर भी. हाल-हाल तक भी उन्हें देखकर और सुनकर कोई जान सकता था की सादगी, विनम्रता और विचारों में दृढ़ता कम्यूनिस्ट मूल्य हैं जिन्हें वे जीते थे. साम्राज्यवाद और सामंतवाद का आजीवन विरोध उन्होंने एक सच्चे कम्यूनिस्ट देशभक्त की तरह किया और इन अर्थों में वे सर्वाधिक रामविलास शर्मा के सहोदर थे. वे भारत के कम्यूनिस्ट आन्दोलन और साहित्य में प्रगतिशील आन्दोलन के जीवंत यादों के चलते-फिरते कोष थे जिससे अचानक वंचित हो जाना सभी वाम संस्कृतिकर्मियों की भारी क्षति है. कल रात रामविलास जी के सुपुत्र श्री विजयमोहन जी बता रहे थे कि १० अक्टूबर को दिल्ली में होनेवाले 'रामविलास शर्मा जन्मशती आयोजन' को लेकर वे खूब उत्साह में थे. क्यों न होते? रामविलास शर्मा के भाई तो थे ही, उनके वैचारिक और रचनात्मक सहयोगी भी थे और उनके न रहने के बाद 'रामविलास शर्मा' फौन्डेशन और शर्मा परिवार के अभिभावक भी. लेकिन कुछ दिन पहले ही वे गिर पड़े थे और फिर स्वस्थ न हो सके.

रामशरण शर्मा 'मुंशी' उन विलक्षण लोगों में थे जिन्होंने कम्यूनिस्ट आन्दोलन और प्रगतिशील साहित्य में अपना योगदान ज़्यादातर नेपथ्य में रहकर किया , जबकि 'इप्टा' में नाटकों में वे नेपथ्य में रहकर नहीं, खुले मंच पर अभिनय करते थे. इप्टा, प्रगतिशील लेखक संघ , कम्यूनिस्ट पार्टी से निकलनेवाले पत्र 'जनयुग' के सम्पादन और पी.पी.एच. के ज़रिए प्रगतिशील साहित्य के नियमित प्रकाशन में उन्होंने जो जिम्मेदारियां निभाईं, वे उनके समय के किसी भी रचनाकार से कम प्रतिभा और प्रतिबद्धता की मांग नहीं करती थीं. शंकर शैलेन्द्र तो शायद उनके सबसे घनिष्ठ मित्र थे ही , लेकिन शमशेर, नरोत्तम नागर, नागार्जुन भी कम आत्मीय न थे. निराला जी की 'राम की शक्तिपूजा' का पाठ , लोगों का कहना है कि मुंशी जी लगभग वैसा ही करते थे जैसा उन्होंने निराला से सुना होगा. केदार नाथ अग्रवाल , अमृतलाल नागर, राहुल, यशपाल से लेकर राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह तक न जाने कितने तब के प्रगतिशील लेखकों से उनका काम-काज का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा, बाद की पीढी के विश्वनाथ त्रिपाठी, नित्यानंद तिवारी, मुरली बाबू , मैनेजर पाण्डेय , रविभूषण आदि उनके स्नेह के सदा ही पात्र रहे.

मुंशी जी श्रेष्ठ अनुवादक और सम्पादक थे. अनुमान किया जा सकता है कि उनके खुद के किए अनुवादों (जिनमें उनका नाम छपा है जैसे कि पी.पी.एच से प्रकाशित डायसन कार्टर की पुस्तक 'सिन एंड साइंस' का अनुवाद 'पाप और विज्ञान' आदि ) से कहीं ज़्यादा अनुवाद ऐसे होंगे जो दूसरों के नाम से निकले होंगे लेकिन ज़्यादा काम मुंशी जी का रहा होगा. राजेन्द्र यादव ने लिखा है कि फाद्येव के रूसी उपन्यास 'मोटर आफ हार्ट' का अनुवाद उन्होंने मुंशी जी के साथ बैठ कर किया था क्योंकि तब पी.पी.एच. में ये रिवाज़ था कि जिस मूल भाषा से अनुवाद किया जाना है उस मूल भाषा के जानकार के साथ बैठना ज़रूरी था. मुंशी जी के साथ इसीलिए बैठना ज़रूरी था कि वे रूसी भाषा के अच्छे जानकार थे. मुंशी जी की 'लाईमलाईट' से अलग रहने की प्रवृत्ति का एक उदाहरण था ६० के दशक में नरोत्तम नागर द्वारा संपादित 'दिल्ली टाइम्स' के अंतिम पेज पर उनके द्वारा उपनाम से लिखना ताकि सम्पादक को सुविधा रहे कि वह जब न चाहे तो न छापे और दुनिया को पता भी न चले. मुंशी जी बतौर लेखक तब भी प्रतिष्ठित नाम थे, अपने नाम से लिखते तो न छाप पाने की दशा में उनके आत्मीय सम्पादक-मित्र की किरकिरी होती.

मुंशी जी सम्पादक कैसे थे ये 'जनयुग' के तब के अंकों से ही नहीं, उनके द्वारा पुष्पलता जैन के साथ मिलकर पी.पी.एच . से निकले ' 'राहुल स्मृति' शीर्षक ग्रन्थ से ही नहीं, बल्कि सर्वाधिक उनके ही उन संस्मरणों से पता चलता है जिनमें वे बताते हैं कि ' बाल जीवनी माला' के तहत निराला पर रामविलास शर्मा, प्रेमचंद पर नागार्जुन और राहुल पर भदंत आनंद कौसल्यायन से उन्होंने कैसे कैसे लिखवाया या फिर 'जनयुग' में किन हिकमतों से वे नागार्जुन से लिखवाते थे. नागार्जुन पर उनके संस्मरणात्मक लेख से पता चलता है कि उनका आलोचना-विवेक कितना गहरा था.

मुंशी जी का परिवार भी उनके और उनकी जीवन-संगिनी धन्नो जी के संस्कारों की गवाही देता है-बेटे, बेटी, बहू सब. धन्नो जी खुद कम्यूनिस्ट आन्दोलन से जुडी रहीं. एक समय वे भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के कंट्रोल कमीशन की सदस्य रहीं, कामरेड रुस्तम सैटिन के साथ. मुंशी जी का जाना उनके परिजन , वाम आन्दोलन और तमाम जनधर्मी सांस्कृतिक आन्दोलन की भारी क्षति है.

तमाम लेखकों उनके बारे में समय समय पर लिखते हुए यह लिखना नहीं भूले है कि वे रामविलास शर्मा के भाई थे. रामविलास जी भले ही अपने बड़े भाई से भावनात्मक रूप से सर्वाधिक जुड़े हुए थे, लेकिन उनके वैचारिक 'संगतकार' तो 'मुंशी' जी थे. ये सिर्फ कयास लगाने की ही बात है कि खुद रामविलास जी के बनने में मुंशी जी की क्या भूमिका रही होगी. याद आती है मंगलेश डबराल की कविता 'संगतकार' जिसके सभी आशयों/अभिप्रायों में मुंशी जी और रामविलास जी का सम्बन्ध भले ही संगत न हो, लेकिन कुछ आशयों में ज़रूर ही ऐसा है-

मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती

वह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई थी

वह मुख्य गायक का छोटा भाई है

या उसका शिष्य

या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार

मुख्य गायक की गरज़ में

वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से

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तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला

प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ

आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ

तभी मुख्य गायक को ढाढस बँधाता

कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर

कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ

यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है

और यह कि फिर से गाया जा सकता है

गाया जा चुका राग

और उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ़ सुनाई देती है

या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है

उसे विफलता नहीं

उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए। (संगतकार- मंगलेश डबराल )

जन संस्कृति मंच मुंशी जी के अवसान के दुःख में उनके परिजन और तमाम प्रगतिशील जमात के साथ है, इस मनुश्य्द्रोही युग में उनके समाजवादी जीवन-मूल्यों को आगे लेते जाने के लिए कृतसंकल्प है.

मुंशी जी को लाल सलाम!

Wednesday, September 12, 2012

डॉ. रामविलास शर्मा - परंपरा के विरुद्ध परंपरा का पाठ